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प्रतिवर्ष बढ़ रही थैलेसीमिया रोगियों की संख्या: डा.तेजेंद्र सिंह - आईईसी काॅलेज में थैलेसीमिया पर सेमिनार का आयोजन

Posted on 2019-11-27

ग्रेटर नोएडा: आईईसी काॅलेज सूरजपुर ग्रेटर नोएडा में बुधवार को थैलेसीमिया पर सेमिनार का आयोजन किया गया। आरएचएएम (संकल्प स्वास्थ्य जागरूकता अभियान) व रोटरी क्लब ऑफ इंदिरापुरम गैलोर, दिल्ली ईस्ट एंड तथा दिल्ली सफदरजंग क्लब द्वारा आयोजित सेमिनार का शुभारंभ मुख्य अतिथि नोएडा सीएमओ डा.अनुराग भार्गव, थैलेसीमिया डिस्ट्रिक 3012 के चेयर डा.धीरज भार्गव, थैलेसीमिया डिस्ट्रिक 3011 की चेयर डा.तेजिंदर सिंह व आईईसी काॅलेज के निर्देशक सुनील कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया। सेमिनार में लोगों ने डाक्टरों से सवाल-जवाब भी किए। इस दौरान मुख्य अतिथि को तुलसी का पौधा भेंटकर सम्मानित किया गया।

सेमिनार को संबोधित करते हुए थैलेसीमिया डिस्ट्रिक 3011 की चेयर डा.तेजिंदर सिंह ने कहा कि थैलेसीमिया एक अनुवांशिक रोग है। इस रोग में लाल रक्त कण नहीं बन पाते हैं और जो बन पाते है वो कुछ समय तक ही रहते है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। ये रोग अनुवांशिक होने के कारण पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। यह रोग काफी कष्टदायक होता है। थैलेसीमिया के रोगियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है। वर्तमान में प्रतिवर्ष 10 हजार थैलेसीमिया के मरीज बढ़ रहे है। दस वर्ष पूर्व यह संख्या 2 हजार प्रतिवर्ष थी। थैलेसीमिया दो तरह का होता है एक माइनर और दूसरा मेजर। दुनिया की कुल आबादी में 20 फीसदी लोग माइनर थैलेसीमिया से ग्रसित है। लेकिन जांच के अभाव में उन्हें इस संबंध में जानकारी नहीं मिल पाती है। उन्होंने बताया कि सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। परंतु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है। हीमोग्लोबीन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है। सामान्यतः एक स्वस्थ मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या 45 से 50 लाख प्रति घन मिलीलीटर होती है। लाल रक्त कोशिकाओं का निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है। इन कोशिकाओं में केंद्रक नहीं होते हैं एवं इनकी जीवन अवधि 120 दिनों तक ही सीमित होती है।

नोएडा सीएमओ डा.अनुराग भार्गव ने भी लोगों को थैलेसीमिया के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार थैलेसीमिया मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। उसके अनुसार हमें जागरूक होने की जरूरत है। जिस प्रकार हम शादी से पूर्व लड़का-लड़की की कुंडली मिलाते है उसी प्रकार हमें शादी से पूर्व थैलेसीमिया का भी टेस्ट कराना चाहिए। जिससे पता चल सके कि कोई इस रोग से तो पीड़ित नहीं है।

थैलेसीमिया डिस्ट्रिक 3012 के चेयर डा.धीरज भार्गव ने सेमिनार को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चों में रोग के लक्षण जन्म से 4 या 6 महीने में ही नजर आने लगते हैं। बच्चे की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है। आंखें और जीभ भी पीली पड़ने लगती है। उसके ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है। दांत उगने में काफी कठिनाइयां होने लगती हैं। त्वचा पीली, यकृत और प्लीहा की लंबाई बढ़ने लगती है तथा बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है। यदि माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हैं, तब बच्चों को इस बीमारी की आशंका अधिक रहती है। अगर माता पिता में किसी एक को यह रोग है तो बच्चे में रोग के मेजर होने की आशंका नहीं रहती। माइनर का शिकार व्यक्ति सामान्य जीवन जीता है और उसे कभी इस बात का आभास तक नहीं होता।
 

इस दौरान सीएमओ डॉ अनुराग भार्गव, डिस्ट्रिक 3011 चेयर थैलेसीमिया डा.तेजिंदर सिंह, थैलेसीमिया डिस्ट्रिक 3012 के चेयर डा.धीरज भार्गव, आईईसी काॅलेज के निर्देशक सुनील कुमार के अलावा रोटरी क्लब ऑफ दिल्ली ईस्ट एंड के अध्यक्ष अनिल छाबड़ा व सचिव दयानंद शर्मा, रोटरी क्लब ऑफ दिल्ली सफदरजंग के सचिव रतन मोना पुरी, रोटेरियन अपूर्व राज, आरएचएएम से श्रीमती अंजली बावा, आईईसी काॅलेज से शरद माहेश्वरी आदि मौजूद रहे।

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